Human Rights vs Dalit Rights in India: क्या फर्क है और दलितों के लिए अलग अधिकार क्यों ज़रूरी हैं?
भारत में Human Rights बनाम दलित अधिकार – क्या अंतर है? भारत एक लोकतांत्रिक देश है जहाँ संविधान हर नागरिक को समान अधिकार देता है। अक्सर हम “Human Rights” यानी मानवाधिकार और “Dalit Rights” यानी दलित अधिकार जैसे शब्द सुनते हैं। पहली नज़र में यह दोनों एक जैसे लग सकते हैं, क्योंकि दलित भी इंसान ही हैं, तो उनके अधिकार भी मानवाधिकार का ही हिस्सा होने चाहिए। लेकिन सामाजिक, ऐतिहासिक और संवैधानिक संदर्भ में इन दोनों के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर मौजूद है। यह अंतर केवल शब्दों का नहीं, बल्कि अनुभव, संघर्ष, इतिहास और सामाजिक वास्तविकताओं से जुड़ा हुआ है। आइए विस्तार से समझते हैं कि भारत में Human Rights और Dalit Rights के बीच क्या अंतर है और यह अंतर क्यों ज़रूरी है। Human Rights क्या हैं? Human Rights यानी मानवाधिकार वे मूल अधिकार हैं जो हर व्यक्ति को सिर्फ़ इंसान होने के नाते मिलते हैं। ये अधिकार किसी देश, जाति, धर्म, लिंग या वर्ग पर निर्भर नहीं करते। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त राष्ट्र (UN) की Universal Declaration of Human Rights (1948) में इन अधिकारों को परिभाषित किया गया। इनम...