भीमा कोरेगांव युद्ध 1818: इतिहास, तथ्य और दलित आत्म-सम्मान का संघर्ष
भीमा कोरेगांव युद्ध (1818): इतिहास, तथ्य और दलित दृष्टिकोण
1 जनवरी 1818 को महाराष्ट्र के पुणे ज़िले में स्थित कोरेगांव भीमा नामक गाँव के पास एक ऐतिहासिक युद्ध हुआ, जिसे आज हम भीमा कोरेगांव युद्ध के नाम से जानते हैं। यह युद्ध ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और मराठा साम्राज्य के अंतिम पेशवा बाजीराव द्वितीय की सेना के बीच लड़ा गया था।
हालाँकि सैन्य दृष्टि से यह एक सीमित स्तर का संघर्ष था, लेकिन सामाजिक और ऐतिहासिक दृष्टि से इसका महत्व अत्यंत गहरा है, विशेषकर भारत के दलित समुदाय के लिए। आज यह युद्ध केवल औपनिवेशिक इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि जाति-आधारित उत्पीड़न के विरुद्ध संघर्ष और आत्म-सम्मान का प्रतीक बन चुका है।
तीसरा आंग्ल-मराठा युद्ध और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
18वीं सदी के अंत तक मराठा साम्राज्य आंतरिक संघर्षों, सत्ता-संघर्ष और क्षेत्रीय अस्थिरता से जूझ रहा था। इसी समय ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने भारत में अपनी राजनीतिक और सैन्य पकड़ मजबूत करना शुरू कर दिया।
1817-1818 के बीच लड़ा गया तीसरा आंग्ल-मराठा युद्ध मराठा शक्ति के पतन और ब्रिटिश प्रभुत्व की स्थापना का निर्णायक चरण था। पेशवा बाजीराव द्वितीय ने अंग्रेज़ों के विरुद्ध विद्रोह किया, लेकिन खड़की और यरवदा जैसी लड़ाइयों में हार के बाद उनकी स्थिति कमजोर हो चुकी थी।
इसी क्रम में 1 जनवरी 1818 को कोरेगांव भीमा के पास यह ऐतिहासिक टकराव हुआ।
युद्ध स्थल और सेनाओं की स्थिति
युद्ध स्थल
कोरेगांव भीमा गाँव, पुणे से लगभग 25 किलोमीटर उत्तर-पूर्व में, भीमा नदी के किनारे स्थित है। यह स्थान रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण था क्योंकि यह पेशवा की गतिविधियों के मार्ग में पड़ता था।
ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना
- कुल सैनिक: लगभग 800–850
- इनमें से बड़ी संख्या महार समुदाय से थी
- नेतृत्व: कैप्टन फ्रांसिस स्टॉन्टन
- सेना में भारतीय पैदल सैनिक, कुछ घुड़सवार और सीमित तोपखाना शामिल था
पेशवा बाजीराव द्वितीय की सेना
- संख्या: हजारों में
- इसमें मराठा घुड़सवार, पैदल सैनिक और स्थानीय सरदारों की टुकड़ियाँ शामिल थीं
- नेतृत्व स्वयं पेशवा के प्रभाव में था
युद्ध की प्रमुख घटनाएँ
ब्रिटिश सेना 31 दिसंबर 1817 की रात सिरूर से चलकर कोरेगांव पहुँची। 1 जनवरी की सुबह पेशवा की सेना ने इस छोटी टुकड़ी पर आक्रमण कर दिया।
दिनभर चले इस संघर्ष में ब्रिटिश-भारतीय सैनिकों ने गाँव के भीतर मोर्चा संभाला। पानी, भोजन और गोला-बारूद की कमी के बावजूद उन्होंने अपनी स्थिति नहीं छोड़ी।
शाम तक पेशवा की सेना पीछे हटने लगी। अगले दिन पेशवा ने इस क्षेत्र से प्रस्थान किया, जिससे ब्रिटिश सेना को रणनीतिक सफलता मिली।
युद्ध का परिणाम और प्रभाव
- पेशवा बाजीराव द्वितीय की शक्ति निर्णायक रूप से कमजोर हो गई
- कुछ ही महीनों बाद पेशवाशाही का अंत हो गया
- मराठा साम्राज्य का राजनीतिक अध्याय समाप्त हुआ
- ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का पश्चिम भारत पर नियंत्रण स्थापित हुआ
1822 में अंग्रेज़ों ने कोरेगांव विजय स्तंभ (Victory Pillar) का निर्माण कराया, जिस पर इस युद्ध में मारे गए सैनिकों के नाम अंकित हैं।
दलित समुदाय का दृष्टिकोण: संघर्ष, स्मृति और आत्म-सम्मान
पेशवाकाल और दलित उत्पीड़न की पृष्ठभूमि
पेशवाकाल (18वीं सदी) में महाराष्ट्र में जाति-आधारित भेदभाव अत्यंत कठोर था।
महार, मांग और अन्य दलित जातियों को:
- सार्वजनिक सड़कों पर चलने से रोका जाता था
- गले में हांडी और कमर में झाड़ू बाँधने को मजबूर किया जाता था
- शिक्षा, हथियार और सम्मानजनक पेशों से वंचित रखा जाता था
इस सामाजिक व्यवस्था में पेशवाशाही दलित समाज के लिए अपमान और दमन का प्रतीक थी।
महार सैनिक और भीमा कोरेगांव
ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना में महार समुदाय के लोगों को सैनिक के रूप में भर्ती किया गया। यह उनके लिए:
- नियमित वेतन
- सामाजिक पहचान
- हथियार उठाने का अधिकार
- और आत्म-सम्मान का अवसर
था।
भीमा कोरेगांव युद्ध में महार सैनिकों की भागीदारी दलित इतिहास में पहली बार संगठित प्रतिरोध की स्मृति बन गई।
डॉ. भीमराव आंबेडकर और कोरेगांव स्तंभ
1 जनवरी 1927 को डॉ. भीमराव आंबेडकर ने कोरेगांव विजय स्तंभ का दौरा किया।
उन्होंने इसे:
“दलित समाज की वीरता और आत्म-सम्मान का ऐतिहासिक प्रमाण”
के रूप में देखा।
इसके बाद यह स्थल दलित आंदोलन का सांस्कृतिक और राजनीतिक प्रतीक बन गया।
आधुनिक दलित आंदोलन में भीमा कोरेगांव
आज हर वर्ष 1 जनवरी को:
- लाखों दलित, बौद्ध और सामाजिक कार्यकर्ता
- कोरेगांव भीमा पहुँचते हैं
- शौर्य, बलिदान और समानता को याद करते हैं
यह आयोजन केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान में समानता और न्याय की मांग का प्रतीक है।
राजनीतिक और सामाजिक विमर्श
भीमा कोरेगांव आज भारत में:
- इतिहास की व्याख्या
- जाति बनाम सत्ता
- स्मृति बनाम वर्चस्व
जैसे मुद्दों का केंद्र बन चुका है।
दलित दृष्टिकोण में यह युद्ध ब्रिटिश समर्थन का नहीं, बल्कि
पेशवाकालीन जातीय उत्पीड़न के विरुद्ध प्रतिरोध की ऐतिहासिक स्मृति है।
निष्कर्ष
भीमा कोरेगांव युद्ध को केवल एक सैन्य संघर्ष के रूप में देखना उसके ऐतिहासिक महत्व को सीमित करना होगा।
यह युद्ध:
- दलित समाज के लिए आत्म-सम्मान
- सामाजिक बराबरी की आकांक्षा
- और उत्पीड़न के विरुद्ध साहस
का प्रतीक बन चुका है।
इतिहास केवल राजाओं और सेनाओं का नहीं होता,
बल्कि उन लोगों का भी होता है जिन्हें सदियों तक इतिहास से बाहर रखा गया।
भीमा कोरेगांव उसी इतिहास की एक सशक्त आवाज़ है।