Shivaji Maharaj और Babasaheb Ambedkar: स्वराज से सामाजिक न्याय तक की क्रांतिकारी विरासत



छत्रपति शिवाजी महाराज, दलित आंदोलन और डॉ. भीमराव अंबेडकर: सामाजिक न्याय की एक साझा परंपरा

भारतीय इतिहास में कुछ ऐसे महान व्यक्तित्व हुए हैं जिन्होंने अपने-अपने समय में अन्याय, असमानता और दमन के विरुद्ध संघर्ष किया। और ऐसे ही दो महान नाम हैं। एक ने 17वीं शताब्दी में राजनीतिक स्वतंत्रता और स्वराज की स्थापना की, तो दूसरे ने 20वीं शताब्दी में सामाजिक समानता और संवैधानिक अधिकारों के माध्यम से दलितों और वंचित वर्गों को सम्मानजनक जीवन का मार्ग दिखाया।

यह लेख इस बात की पड़ताल करता है कि शिवाजी महाराज की शासन-नीति और डॉ. अंबेडकर के नेतृत्व में चले दलित आंदोलन के बीच क्या वैचारिक समानताएँ हैं, और कैसे दोनों ने सामाजिक न्याय की एक साझा परंपरा को मजबूत किया।


छत्रपति शिवाजी महाराज: केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना के प्रतीक

छत्रपति शिवाजी महाराज को सामान्यतः एक महान योद्धा और मराठा साम्राज्य के संस्थापक के रूप में जाना जाता है। लेकिन उनका व्यक्तित्व केवल सैन्य कौशल तक सीमित नहीं था। वे एक दूरदर्शी शासक थे जिन्होंने शासन में समानता, न्याय और धर्मनिरपेक्षता को महत्व दिया।

1. सामाजिक समावेशिता

शिवाजी महाराज ने अपने शासन में विभिन्न जातियों और वर्गों के लोगों को महत्वपूर्ण पद दिए। उनकी सेना और प्रशासन में केवल उच्च जातियों का ही वर्चस्व नहीं था, बल्कि दलित और पिछड़े वर्गों के लोगों को भी अवसर मिला। उस समय जब भारतीय समाज कठोर जाति व्यवस्था से जकड़ा हुआ था, तब यह कदम अत्यंत प्रगतिशील माना जा सकता है।

2. महिलाओं और कमजोर वर्गों की सुरक्षा

शिवाजी महाराज ने युद्ध के दौरान महिलाओं के सम्मान की रक्षा के लिए सख्त नियम बनाए। उन्होंने किसी भी धर्म या जाति की महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार को गंभीर अपराध माना। यह उस युग में एक क्रांतिकारी सोच थी।

3. धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण

हालांकि वे हिंदू राजा थे, लेकिन उन्होंने मुस्लिम सैनिकों और अधिकारियों को भी अपने प्रशासन में स्थान दिया। उन्होंने मस्जिदों और धार्मिक स्थलों की रक्षा की। उनका संघर्ष किसी धर्म के विरुद्ध नहीं, बल्कि अत्याचार और अन्याय के विरुद्ध था।


डॉ. भीमराव अंबेडकर और दलित आंदोलन

20वीं सदी में भारत सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा था। इसी समय डॉ. अंबेडकर ने दलितों के अधिकारों के लिए संगठित संघर्ष शुरू किया।

1. जाति व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष

डॉ. अंबेडकर ने अपने लेखन और आंदोलनों के माध्यम से जाति व्यवस्था की जड़ पर प्रहार किया। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक Annihilation of Caste में उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि जब तक जाति व्यवस्था समाप्त नहीं होगी, तब तक सामाजिक लोकतंत्र संभव नहीं है।

2. महाड़ सत्याग्रह और मंदिर प्रवेश आंदोलन

1927 में महाड़ सत्याग्रह के माध्यम से उन्होंने दलितों को सार्वजनिक जलस्रोतों से पानी लेने का अधिकार दिलाने के लिए संघर्ष किया। यह केवल पानी का प्रश्न नहीं था, बल्कि सम्मान और समानता का सवाल था।

3. भारतीय संविधान का निर्माण

स्वतंत्र भारत के संविधान निर्माता के रूप में डॉ. अंबेडकर ने समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के सिद्धांतों को संविधान की आधारशिला बनाया। मौलिक अधिकारों और अनुसूचित जाति-जनजाति के लिए आरक्षण की व्यवस्था ने दलित समाज को नई दिशा दी।


शिवाजी और अंबेडकर: विचारों की समानता

यद्यपि दोनों अलग-अलग कालखंडों में हुए, फिर भी उनके विचारों में कुछ महत्वपूर्ण समानताएँ दिखाई देती हैं।

1. अन्याय के विरुद्ध संघर्ष

शिवाजी ने मुगल साम्राज्य और अन्य दमनकारी शक्तियों के विरुद्ध संघर्ष किया। उनका उद्देश्य स्वराज की स्थापना था—एक ऐसा शासन जहाँ जनता को सम्मान और सुरक्षा मिले।
डॉ. अंबेडकर ने सामाजिक दमन और ब्राह्मणवादी व्यवस्था के विरुद्ध संघर्ष किया। उनका लक्ष्य सामाजिक स्वराज था।

2. समावेशी नेतृत्व

शिवाजी की सेना और प्रशासन में विभिन्न जातियों के लोग थे।
अंबेडकर ने दलितों, मजदूरों, महिलाओं और अन्य वंचित वर्गों को संगठित किया।

3. न्याय आधारित शासन

शिवाजी का शासन न्यायप्रिय माना जाता है। उन्होंने कर प्रणाली को व्यवस्थित किया और किसानों के हितों की रक्षा की।
अंबेडकर ने संवैधानिक प्रावधानों के माध्यम से सामाजिक और आर्थिक न्याय सुनिश्चित करने का प्रयास किया।


दलित आंदोलन में शिवाजी की प्रेरणा

महाराष्ट्र और अन्य राज्यों में दलित आंदोलन ने शिवाजी महाराज को केवल एक मराठा नायक के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय के प्रतीक के रूप में भी देखा। कई दलित चिंतकों ने यह तर्क दिया कि शिवाजी का शासन ब्राह्मणवादी वर्चस्व को चुनौती देने वाला था।

डॉ. अंबेडकर स्वयं महाराष्ट्र से थे और उन्होंने शिवाजी के ऐतिहासिक महत्व को समझा। हालांकि उन्होंने शिवाजी पर विस्तृत लेखन नहीं किया, लेकिन सामाजिक समानता की जो भावना शिवाजी के शासन में दिखती है, वह अंबेडकर के विचारों से मेल खाती है।


ऐतिहासिक विमर्श और विवाद

यह भी सच है कि शिवाजी और दलित आंदोलन के संबंध को लेकर विभिन्न इतिहासकारों के बीच मतभेद हैं। कुछ विद्वान मानते हैं कि शिवाजी अपने समय की सामाजिक सीमाओं से पूरी तरह मुक्त नहीं थे। वहीं अन्य इतिहासकार उन्हें एक प्रगतिशील और समावेशी शासक के रूप में देखते हैं।

इसी प्रकार, अंबेडकर के विचारों को भी कई बार गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा था कि सामाजिक लोकतंत्र के बिना राजनीतिक लोकतंत्र अधूरा है।


वर्तमान परिप्रेक्ष्य में महत्व

आज जब भारत में सामाजिक न्याय, आरक्षण और समानता जैसे मुद्दों पर बहस होती है, तब शिवाजी और अंबेडकर दोनों की विरासत प्रासंगिक हो जाती है।

  • शिवाजी हमें सिखाते हैं कि राजनीतिक स्वतंत्रता और स्वाभिमान आवश्यक है।
  • अंबेडकर हमें बताते हैं कि सामाजिक समानता और संवैधानिक अधिकारों के बिना स्वतंत्रता अधूरी है।

दलित आंदोलन आज भी शिक्षा, प्रतिनिधित्व और सम्मान के लिए संघर्ष कर रहा है। ऐसे में इन दोनों महान व्यक्तित्वों की शिक्षाएँ प्रेरणा का स्रोत हैं।


निष्कर्ष

छत्रपति शिवाजी महाराज और डॉ. भीमराव अंबेडकर भारतीय इतिहास के दो ऐसे स्तंभ हैं जिन्होंने अलग-अलग युगों में सामाजिक न्याय की नींव को मजबूत किया। एक ने तलवार के बल पर स्वराज स्थापित किया, तो दूसरे ने कलम और संविधान के माध्यम से सामाजिक क्रांति की।

दलित आंदोलन को समझने के लिए केवल 20वीं सदी के आंदोलनों को देखना पर्याप्त नहीं है, बल्कि हमें उन ऐतिहासिक परंपराओं को भी समझना होगा जिन्होंने समानता और न्याय की चेतना को जन्म दिया। शिवाजी और अंबेडकर दोनों की विरासत हमें यह संदेश देती है कि असली शक्ति जनता की एकता, न्याय और मानवता में निहित है।

आज आवश्यकता है कि हम इन दोनों महान व्यक्तित्वों के विचारों को संकीर्ण राजनीति से ऊपर उठकर समझें और उनके मूल संदेश—समानता, न्याय और बंधुत्व—को अपने जीवन में अपनाएँ। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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