Article 17 Explained: 2025 में भारत में Untouchability कितनी खत्म हुई और कितनी बदल गई?




Article 17 Explained: 2025 में Untouchability की बदलती सच्चाई

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 17 केवल एक कानूनी प्रावधान नहीं है, बल्कि यह उस ऐतिहासिक अन्याय के विरुद्ध एक निर्णायक घोषणा है, जिसने सदियों तक भारतीय समाज को भीतर से तोड़कर रखा। “अस्पृश्यता का उन्मूलन” केवल शब्दों में नहीं, बल्कि एक नैतिक, सामाजिक और संवैधानिक क्रांति का प्रतीक है।
लेकिन 2025 में खड़े होकर जब हम इस अनुच्छेद की स्थिति का मूल्यांकन करते हैं, तो एक बड़ा प्रश्न सामने आता है—
क्या अस्पृश्यता वास्तव में समाप्त हो चुकी है, या उसने केवल अपना रूप बदल लिया है?


अनुच्छेद 17 क्या कहता है? – संवैधानिक अर्थ

अनुच्छेद 17 स्पष्ट शब्दों में घोषणा करता है कि अस्पृश्यता का उन्मूलन किया जाता है और किसी भी रूप में इसका अभ्यास दंडनीय अपराध होगा। यह अनुच्छेद किसी अपवाद, परंपरा या धार्मिक तर्क को स्वीकार नहीं करता।

यह भारतीय संविधान के उन गिने-चुने अनुच्छेदों में से है जो सीधे सामाजिक व्यवहार को अपराध की श्रेणी में लाते हैं।

डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान सभा में इसे केवल एक सुधारात्मक कानून नहीं, बल्कि सामाजिक बराबरी की नींव बताया था। उनका मानना था कि जब तक समाज में बराबरी व्यवहार में नहीं आएगी, तब तक राजनीतिक लोकतंत्र अधूरा रहेगा।


अस्पृश्यता की ऐतिहासिक जड़ें

अस्पृश्यता कोई प्राकृतिक या ईश्वरीय व्यवस्था नहीं थी, बल्कि एक सुनियोजित सामाजिक संरचना का परिणाम थी।
धार्मिक ग्रंथों की पक्षपाती व्याख्याओं, जातिगत श्रेणियों और पेशों के आधार पर कुछ समुदायों को मनुष्य से कम समझा गया।

मंदिर, पानी के स्रोत, शिक्षा और रोजगार—हर क्षेत्र में भेदभाव को सामाजिक “सामान्यता” बना दिया गया।

औपनिवेशिक काल में भी अंग्रेजों ने इस व्यवस्था को पूरी तरह नहीं तोड़ा, बल्कि कई बार प्रशासनिक सुविधा के लिए इसे दर्ज और स्थिर किया। इसी कारण संविधान निर्माण के समय अनुच्छेद 17 को केवल नैतिक घोषणा नहीं, बल्कि दंडात्मक कानून के रूप में शामिल किया गया।


कानून के बावजूद सामाजिक व्यवहार क्यों नहीं बदला?

1955 में अस्पृश्यता निवारण अधिनियम और बाद में SC/ST अत्याचार निवारण अधिनियम जैसे कानून बनाए गए।
फिर भी जमीनी सच्चाई यह है कि कानून सामाजिक सोच से तेज़ नहीं चल सका।

2025 में अस्पृश्यता अब खुले और पारंपरिक रूप में कम दिखाई देती है, लेकिन इसके नए और सूक्ष्म रूप सामने आए हैं, जैसे—

  • अलग बैठने की व्यवस्था
  • किराए पर घर न देना
  • स्कूलों में सामाजिक दूरी
  • विवाह और रिश्तों में जाति का दबाव
  • सोशल मीडिया पर नफरत और ट्रोलिंग

आज अस्पृश्यता मंदिर के बाहर “अलग कुएँ” के रूप में नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवहार और मानसिकता में मौजूद है।


ग्रामीण भारत में 2025 की वास्तविक स्थिति

ग्रामीण भारत में अस्पृश्यता का प्रभाव आज भी गहराई से मौजूद है। कई राज्यों में सामुदायिक भोज में अलग पंक्ति, अंतिम संस्कार में भेदभाव और पंचायत स्तर पर सामाजिक बहिष्कार की घटनाएँ अब भी सामने आती हैं।

अक्सर इन घटनाओं को “परंपरा” या “स्थानीय रीति” के नाम पर छुपा दिया जाता है।
पीड़ित व्यक्ति शिकायत करना भी चाहे, तो सामाजिक दबाव, आर्थिक निर्भरता और भय उसे पीछे हटने पर मजबूर कर देते हैं।


शहरी भारत और छुपी हुई अस्पृश्यता

शहरी समाज अक्सर यह मान लेता है कि जातिवाद समाप्त हो चुका है, लेकिन यह एक भ्रम है।
यहाँ अस्पृश्यता सीधे दिखाई नहीं देती, बल्कि “मेरिट”, “कल्चर फिट” और “बैकग्राउंड” जैसे शब्दों में छुपी रहती है।

कॉर्पोरेट सेक्टर, हाउसिंग सोसायटी, निजी स्कूल और विवाह वेबसाइट—हर जगह जाति आज भी निर्णय लेने का मौन आधार बनी हुई है।
अंतर सिर्फ़ इतना है कि अब इसे खुले रूप में स्वीकार नहीं किया जाता, बल्कि छुपाया जाता है।


डिजिटल युग और नई तरह की अस्पृश्यता

2025 में सोशल मीडिया ने अस्पृश्यता को एक नया मंच दिया है।
फर्जी नामों से नफरत फैलाना, इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश करना और पीड़ित समुदायों को केवल “आरक्षण आधारित पहचान” में सीमित कर देना—ये आधुनिक अस्पृश्यता के नए रूप हैं।

डिजिटल दुनिया में अनुच्छेद 17 की भावना को लागू करना एक बड़ी चुनौती बन चुका है, क्योंकि कानून अभी भी मुख्य रूप से भौतिक घटनाओं तक सीमित है।


न्यायपालिका और अनुच्छेद 17 की व्याख्या

भारतीय न्यायपालिका ने समय-समय पर अनुच्छेद 17 की व्यापक और प्रगतिशील व्याख्या की है। अदालतों ने माना है कि अस्पृश्यता केवल शारीरिक दूरी नहीं, बल्कि किसी भी प्रकार का सामाजिक अपमान, बहिष्कार और भेदभाव है।

हालाँकि, न्याय की प्रक्रिया लंबी, महंगी और जटिल होने के कारण 2025 में भी बहुत से पीड़ित न्याय से दूर रह जाते हैं।


क्या शिक्षा जातिवाद का समाधान है?

शिक्षा को अक्सर जातिवाद का समाधान बताया जाता है, लेकिन सच्चाई यह है कि शिक्षा ने कई बार भेदभाव को और अधिक परिष्कृत बना दिया है।
जब तक शिक्षा व्यवस्था में संवैधानिक मूल्य, सामाजिक न्याय और इतिहास की ईमानदार समझ शामिल नहीं होगी, तब तक केवल डिग्रियाँ मानसिकता नहीं बदल सकतीं।


2025 में अनुच्छेद 17 का बदलता अर्थ

आज अनुच्छेद 17 का अर्थ केवल “अस्पृश्यता निषेध” तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
यह अब मानव गरिमा की रक्षा, सम्मान के साथ जीने का अधिकार और समान सामाजिक व्यवहार का प्रतीक होना चाहिए।

आने वाले समय में इसकी प्रासंगिकता और बढ़ेगी, क्योंकि सामाजिक असमानता नए-नए रूपों में सामने आ रही है।

इसके लिए आवश्यक है—

  • कानून का सख्त और निष्पक्ष क्रियान्वयन
  • समाज में ईमानदार संवाद और आत्ममंथन
  • मीडिया और शिक्षा की जवाबदेही
  • और संविधान को केवल किताब नहीं, जीवन का मार्गदर्शक मानना

निष्कर्ष: अनुच्छेद 17 और हमारी सामूहिक जिम्मेदारी

अनुच्छेद 17 आज भी उतना ही प्रासंगिक है जितना 1950 में था।
फर्क केवल इतना है कि अब लड़ाई दिखाई देने वाली जंजीरों से नहीं, बल्कि अदृश्य दीवारों से है।

2025 में सवाल यह नहीं है कि अस्पृश्यता खत्म हुई या नहीं, बल्कि यह है कि क्या हम उसे पहचानने और स्वीकार करने का साहस रखते हैं।

जब तक किसी भी व्यक्ति को उसकी जन्म पहचान के आधार पर कमतर समझा जाता रहेगा, तब तक अनुच्छेद 17 केवल संविधान का अनुच्छेद नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक असफलता की याद दिलाता रहेगा।


✍️ Written by: Kaushal Asodiya


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